ग़ज़ल (स्वरचित)
द्वारा
महेश चन्द्र रस्तोगी ‘चन्द्र‘
बह्र: २२१ २१२१ १२२१ २१२
आयी खुशी बस एक पल आई गुजर गयी
पत्ते कुछ इस तरह खुले बाजी बिखर गयी।
इक दिलरुबा परी सी थी रहती पड़ोस में
देखा जो उसको आशिक़ी दिल में उतर गयी।
इक खत दबा के रख दिया पन्नों के बीच में
मेरी किताब सबसे छुपा कर ले घर गयी।
कुछ रोज सिलसिला यूँ ही चलता रहा मगर
इक रोज सारे सब्र की पूँजी बिखर गयी ।
इक रोज़ पूछ ही लिया उस महजबीन से
इसमें रखी थी एक जो पर्ची किधर गयी ।
शरमा के लाली छा गयी गालों के रंग पे
अन्जान हो के बोले कि शायद वो गिर गयी ।
दिल हम लुटाए बैठे थे यूं आशिकी में पर
दिल माँगा उससे हमने तो सीधे मुकर गयी।
दिन रात उसके दर पे हमारी थी टकटकी
पीछे चले थे हम भी वो जिस रहगुजर गयी।
इक रोज़ आके तंग वो घर माँ से आ मिली
ये 'चन्द्र' छेड़ता है, शिकायत ही कर गयी।
----- महेश चन्द्र रस्तोगी २३|१०|२०२०
२२१-२१२१-१२२१-२१२
हम काट देंगे उम्र यूॅं ही इंतज़ार में
कह कर गए हैं आएंगे अगली बहार में।।१
बाज़ार पाई-पाई गयी ले के जेब से
बरकत भी अब नहीं है मेरे रोज़गार में ।।२
चहरा बदल गया है वो तासीर खो गई
कार-ए-सवाब बदला किसी कारोबार में।।३
शैतान इस ज़हाॅं का ख़ुदा बन गया हो तो
मैं किसका नाम लूॅं ये बता अब गुहार में।।४
हमने सिवाय अपने किसी की सुनी न थी
सारे अक़ीदे उड़ गए ग़म की बयार में।।५
मुद्दत से दिल में कोई भी आहट तलक न थी
ये कौन आ गया है इस उजड़े दयार में।।६
बेदिल कहे जो 'चन्द्र' तो लगता नहीं बुरा
दिल हम ही छोड़ आए हैं कूचा-ए-यार में।।७
____चन्द्र, रस्तोगी महेश
भिलाई छग