POEMS

Tuesday, October 29, 2024

अफ़वाहों से देखो भ्रमित हैं ये दिशाएं किस तरह


अफ़वाहों से देखो भ्रमित हैं ये दिशाएं किस तरह 
गुलशन में आयीं रुत बदलती ये हवाएं किस तरह

तुलसी के आगे पस्त हैं पौधे ये गाजर-घास के 
वरना इसी साज़िश में थे गुलशन में छाएं किस तरह 

अब सेंधमारी बैंक के खातों में भी होने लगी 
पैसा बचाएं किस तरह और घर चलाएं किस तरह 

मक़सद है कुछ हम सिर्फ़ जीने के लिए आए नहीं 
सबसे बड़ा है ये भरम इसको मिटाएं किस तरह

रस घोलतीं कानों में बातें चाॅंद सा चेहरा लिए 
इतना हसीं ठग हो अगर धोखा न खाएं किस तरह 

ऐ घर से भागे तिफ्ल कुछ अंदाज़ है माॅं बाप का
किस मृत्यु सम पीड़ा से गुज़रे वो बताएं किस तरह 

दश्ते-बयाबाॅं है हमारी आज़माइश के लिए 
जीने का साधन हो सके वो लक्ष्य पाएं किस तरह 
____चन्द्र, रस्तोगी महेश 
भिलाई छग

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