POEMS

Wednesday, October 30, 2024

ग़ज़ल: कितने आराम में करार में था

(१)
कितने आराम में करार में था 
जब मेरा दिल तेरे दयार में था

तुझको पाने तुझे पता भी नहीं 
कितनी लंबी मैं इक कतार में था

वो भी दिन था सड़क पे छेड़ा तुझे 
हौसला तब किसी शुमार में था

आ गया हूॅं वहाॅं तलक चलकर 
मैं ज़हाॅं तक तेरे ख़ुमार में था 

नज़र आया वो बे-गुनाह मुझे 
नाम जिसका कुसूरवार में था

बड़बड़ाता था हर कोई तेरा नाम
या मैं ही तप रहा बुखार में था

'चंद्र' तुझको सलाम कर लेता
वो भी लेकिन न इख़्तियार में था
____चन्द्र, रस्तोगी महेश 
भिलाई छग

(२)
काश तदबीर कोई जग जाए
दौलते-मुफ़्त हाथ लग जाए

जिस्म के जाल में क्यों उलझे हो
ज़र तो ज़र आबरू अलग जाए

मेल उनसे भी रखना पड़ता है 
जिनको देखें तो जाॅं सुलग जाए

ऑंखें मल मल के जागता हूॅं कहीं 
तुझसे पहले न ऑंख लग जाए

फ़र्ज़ तुम पर न इतना भारी हो
साॅंस सीने में ही हिलग जाए

खोल दें वो अगर ज़ुबां अपनी 
तो शराफ़त कहीं सुलग जाए 

'चन्द्र' मुझको यूॅं सोचता है बहुत 
अब दबाई कहाॅं की रग जाए
____चन्द्र, रस्तोगी महेश 
भिलाई छग 

Tuesday, October 29, 2024

अफ़वाहों से देखो भ्रमित हैं ये दिशाएं किस तरह


अफ़वाहों से देखो भ्रमित हैं ये दिशाएं किस तरह 
गुलशन में आयीं रुत बदलती ये हवाएं किस तरह

तुलसी के आगे पस्त हैं पौधे ये गाजर-घास के 
वरना इसी साज़िश में थे गुलशन में छाएं किस तरह 

अब सेंधमारी बैंक के खातों में भी होने लगी 
पैसा बचाएं किस तरह और घर चलाएं किस तरह 

मक़सद है कुछ हम सिर्फ़ जीने के लिए आए नहीं 
सबसे बड़ा है ये भरम इसको मिटाएं किस तरह

रस घोलतीं कानों में बातें चाॅंद सा चेहरा लिए 
इतना हसीं ठग हो अगर धोखा न खाएं किस तरह 

ऐ घर से भागे तिफ्ल कुछ अंदाज़ है माॅं बाप का
किस मृत्यु सम पीड़ा से गुज़रे वो बताएं किस तरह 

दश्ते-बयाबाॅं है हमारी आज़माइश के लिए 
जीने का साधन हो सके वो लक्ष्य पाएं किस तरह 
____चन्द्र, रस्तोगी महेश 
भिलाई छग