POEMS

Friday, December 20, 2024

इंसानियत भी जुर्म है तेरे ज़हान में

इन्सानियत भी जुर्म है तेरे जहान में
है बेबसी जीना मिरा ऐसे जहान में

मक्कारियाँ जादूगरी धोखा फ़रेब और
क्या क्या नहीं अहवाल हैं अहले जहान में

रखना ज़मी पे पाँव भी थोड़ा संभाल के
विषधर पड़े सोये हुए डसने जहान में 

रच रूप सन्तों का लुटेरा लूटता नगर
जयकार उसकी हो रही अन्धे जहान में 

हर तीर उसका बैठता जाकर निशान पे
भरने से पहले ज़ख़्म फिर मिलते जहान में 

साजिश बड़ी इस आदमी की चन्द्र जान ले
टुकड़ों में बाँटा आदमी इसने जहान में 

QR for Kankariyaan

the book Kankariyaan contains gazals all composed by Mahesh Chandra Rastogi, with pen-name 'चन्द्र'
The book named "Kankariyan" (कंकरियाॅं) belongs to Mahesh Chandra Rastogi, the author of the same, it is a collection of ghazals composed by the author with the pen-name Chandr (चन्द्र)

Wednesday, December 11, 2024

ग़ज़ल: आयी खुशी बस एक पल आई गुजर गयी

ग़ज़ल (स्वरचित)
द्वारा 
महेश चन्द्र रस्तोगी ‘चन्द्र‘
बह्र:  २२१ २१२१  १२२१  २१२

आयी खुशी बस एक पल आई गुजर गयी
पत्ते कुछ इस तरह खुले बाजी बिखर गयी।

इक दिलरुबा परी सी थी रहती पड़ोस में 
देखा जो उसको आशिक़ी दिल में उतर गयी।

इक खत दबा के रख दिया पन्नों के बीच में 
मेरी किताब सबसे छुपा कर ले घर गयी। 

कुछ रोज सिलसिला यूँ ही चलता रहा मगर 
इक रोज सारे सब्र की पूँजी  बिखर गयी ।

इक रोज़ पूछ ही लिया उस महजबीन से
इसमें रखी थी एक जो पर्ची किधर गयी ।

शरमा के लाली छा गयी गालों के रंग पे
अन्जान हो के बोले कि शायद वो गिर गयी ।
दिल हम लुटाए बैठे थे यूं आशिकी में पर
दिल माँगा उससे हमने तो सीधे मुकर गयी।

दिन रात उसके दर पे हमारी थी टकटकी
पीछे चले थे हम भी वो जिस रहगुजर गयी।

इक रोज़ आके तंग वो घर माँ से आ मिली
ये 'चन्द्र' छेड़ता है, शिकायत ही कर गयी।
----- महेश चन्द्र रस्तोगी २३|१०|२०२०

२२१-२१२१-१२२१-२१२
हम काट देंगे उम्र यूॅं ही इंतज़ार में 
कह कर गए हैं आएंगे अगली बहार में।।१

बाज़ार पाई-पाई गयी ले के जेब से 
बरकत भी अब नहीं है मेरे रोज़गार में ।।२

चहरा बदल गया है वो तासीर खो गई 
कार-ए-सवाब बदला किसी कारोबार में।।३

शैतान इस ज़हाॅं का ख़ुदा बन गया हो तो 
मैं किसका नाम लूॅं ये बता अब गुहार में।।४

हमने सिवाय अपने किसी की सुनी न थी 
सारे अक़ीदे उड़ गए ग़म की बयार में।।५

मुद्दत से दिल में कोई भी आहट तलक न थी 
ये कौन आ गया है इस उजड़े दयार में।।६

बेदिल कहे जो 'चन्द्र' तो लगता नहीं बुरा 
दिल हम ही छोड़ आए हैं कूचा-ए-यार में।।७
____चन्द्र, रस्तोगी महेश 
भिलाई छग

Thursday, December 5, 2024

बुत-परस्ती राह है उस तक पहुंचने की

२१२२-२१२२-२१२२-२
हर हसीं गुलशन को तू सहरा बनाता चल
और फिर सहराओं के तू गीत गाता चल।
हो सके सहरा को तू गुलशन बनाता चल
फिर बहारों पर कोई नग़्मा भी गाता चल

हर तरफ़ शादाब धरती देखनी हो गर
रेग़ज़ारों में भी तू दरिया बहाता चल 

पत्थरों के शह्र से यूॅं ही गुज़रना क्या 
घिस के हर पत्थर को तू शीशा बनाता चल

मुल्क पर अहसान ये भी कम नहीं होगा 
शादियां कर सात आबादी बढ़ाता चल

बुत-परस्ती राह है उस तक पहुंचने की
अपने इस विश्वास को आगे बढ़ाता चल।।