POEMS

Friday, December 20, 2024

इंसानियत भी जुर्म है तेरे ज़हान में

इन्सानियत भी जुर्म है तेरे जहान में
है बेबसी जीना मिरा ऐसे जहान में

मक्कारियाँ जादूगरी धोखा फ़रेब और
क्या क्या नहीं अहवाल हैं अहले जहान में

रखना ज़मी पे पाँव भी थोड़ा संभाल के
विषधर पड़े सोये हुए डसने जहान में 

रच रूप सन्तों का लुटेरा लूटता नगर
जयकार उसकी हो रही अन्धे जहान में 

हर तीर उसका बैठता जाकर निशान पे
भरने से पहले ज़ख़्म फिर मिलते जहान में 

साजिश बड़ी इस आदमी की चन्द्र जान ले
टुकड़ों में बाँटा आदमी इसने जहान में 

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