परीक्षा कक्ष में
प्रश्न पत्र हल करने का
एक सलीका बताया जाता है
उलझाने वाले प्रश्नों में
मत उलझो
पहले उन प्रश्नों को हल करो
जिनके उत्तर
सरलता से मिल जाएँ
फिर उन प्रश्नों को लें
अवश्य जो कुछ कठिन हैं
पर उलझाते नहीं
और अंत में
उलझाने वाले प्रश्नों को
ठन्डे दिमाग से
सुलझाने का प्रयास करें
ज़िन्दगी जीने का
सलीका भी तो यही है।
द्वारा : महेश चन्द्र रस्तोगी
Friday, April 30, 2010
Sunday, April 25, 2010
ताले
मेरा ही आँगन सूखा रह जाता है
जबकि मेरी छत से ही होकर जाता है बादल
सितारों से जड़ी ओढ़नी का क्या करूँ
नर्म मखमली कालीन का क्या करूँ
गुलाबी गालों के
रसीले होंठों के
होने का क्या करूँ / ये मेरे नहीं
माथे पे चस्पा है शराफत का लेबल
ताले तोडूँ कैसे
मेरा ही कमरा है खुशबू से महरूम
जबकि मेरी ही खिड़की से होकर जाती है बहार
------ द्वारा: महेश चन्द्र रस्तोगी
जबकि मेरी छत से ही होकर जाता है बादल
सितारों से जड़ी ओढ़नी का क्या करूँ
नर्म मखमली कालीन का क्या करूँ
गुलाबी गालों के
रसीले होंठों के
होने का क्या करूँ / ये मेरे नहीं
माथे पे चस्पा है शराफत का लेबल
ताले तोडूँ कैसे
मेरा ही कमरा है खुशबू से महरूम
जबकि मेरी ही खिड़की से होकर जाती है बहार
------ द्वारा: महेश चन्द्र रस्तोगी
Friday, April 16, 2010
शाम का वक़्त
राह चुनने का अवसर तो
विरले ही मिलता है इसे
अमूमन धकेल दिया जाता है
किसी भी डगर पे इसे
चलने की विवशता
निगल जाती है सम्बन्ध कितने ही
नागपाश जैसे बन्ध
सहे जाती है कितने ही
रेतके विशाल, अनदेखे
समंदर के सीने पे
पथ निर्माण करती
हर बार, हर इनकार से
ढलते वक़्त में ढोती
वो पथ अपने काँधे पे
खदेड़ा जिस पथ पे इसे
बार बार, हर इनकार से
ओ ज़िन्दगी, स्वीकार ले
बूढा हो गया हूँ मैं
अन्यथा फिर इस हेकड़ मरुस्थल
के सीने को चीर कर
एक नया पथ बना देता
अब तो बस तू
मेरा दामन थाम के रख
मैं चल रहा हूँ साथ तेरे
बस चलने के लिए.
द्वारा: महेश चन्द्र रस्तोगी
विरले ही मिलता है इसे
अमूमन धकेल दिया जाता है
किसी भी डगर पे इसे
चलने की विवशता
निगल जाती है सम्बन्ध कितने ही
नागपाश जैसे बन्ध
सहे जाती है कितने ही
रेतके विशाल, अनदेखे
समंदर के सीने पे
पथ निर्माण करती
हर बार, हर इनकार से
ढलते वक़्त में ढोती
वो पथ अपने काँधे पे
खदेड़ा जिस पथ पे इसे
बार बार, हर इनकार से
ओ ज़िन्दगी, स्वीकार ले
बूढा हो गया हूँ मैं
अन्यथा फिर इस हेकड़ मरुस्थल
के सीने को चीर कर
एक नया पथ बना देता
अब तो बस तू
मेरा दामन थाम के रख
मैं चल रहा हूँ साथ तेरे
बस चलने के लिए.
द्वारा: महेश चन्द्र रस्तोगी
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