विरले ही मिलता है इसे
अमूमन धकेल दिया जाता है
किसी भी डगर पे इसे
चलने की विवशता
निगल जाती है सम्बन्ध कितने ही
नागपाश जैसे बन्ध
सहे जाती है कितने ही
रेतके विशाल, अनदेखे
समंदर के सीने पे
पथ निर्माण करती
हर बार, हर इनकार से
ढलते वक़्त में ढोती
वो पथ अपने काँधे पे
खदेड़ा जिस पथ पे इसे
बार बार, हर इनकार से
ओ ज़िन्दगी, स्वीकार ले
बूढा हो गया हूँ मैं
अन्यथा फिर इस हेकड़ मरुस्थल
के सीने को चीर कर
एक नया पथ बना देता
अब तो बस तू
मेरा दामन थाम के रख
मैं चल रहा हूँ साथ तेरे
बस चलने के लिए.
द्वारा: महेश चन्द्र रस्तोगी
No comments:
Post a Comment