POEMS

Friday, April 16, 2010

शाम का वक़्त

राह चुनने का अवसर तो
विरले ही मिलता है इसे
अमूमन धकेल दिया जाता है

किसी भी डगर पे इसे
चलने की विवशता
निगल जाती है सम्बन्ध कितने ही
नागपाश जैसे बन्ध
सहे जाती है कितने ही

रेतके विशाल, अनदेखे
समंदर के सीने पे
पथ निर्माण करती
हर बार, हर इनकार से
ढलते वक़्त में ढोती
वो पथ अपने काँधे पे
खदेड़ा जिस पथ पे इसे
बार बार, हर इनकार से

ओ ज़िन्दगी, स्वीकार ले
बूढा हो गया हूँ मैं
अन्यथा फिर इस हेकड़ मरुस्थल
के सीने को चीर कर
एक नया पथ बना देता

अब तो बस तू
मेरा दामन थाम के रख
मैं चल रहा हूँ साथ तेरे
बस चलने के लिए.

द्वारा: महेश चन्द्र रस्तोगी

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