POEMS

Monday, July 18, 2011

ChhoTi Bhulen

chhoti chhoti bhulen milkar hamko insaan bhi banaati hain.
chhoti chhoti bhulen milkar hamko insaan bhi banaati hain.

ताले

मेरा ही आँगन सूखा रह जाता है
जबकि मेरी छत से ही होकर जाता है बादल
सितारों से जड़ी ओढ़नी का क्या करूँ

नर्म मखमली कालीन का क्या करूँ
गुलाबी गालों के
रसीले होंठों के
होने का क्या करूँ / ये मेरे नहीं
माथे पे शराफत label का चस्पा है
ताले तोड़ूँ कैसे
मेरा ही कमरा है खुशबू से महरूम
जबकि मेरी ही खिड़की से होकर जाती है बहार
------ द्वारा: महेश चन्द्र रस्तोगी

Wednesday, May 18, 2011

अपना सलीका

किस काम के लिए आये थे 
कुछ याद नहीं 
क्या करने लगे ?
क्यों करने लगे ?
बस कुछ करना है 
और करते गए !
लोग सही - गलत 
समझाते रहे 
हम अपना सही - गलत 
बनाते रहे 
अपनी ही तरह से 
देखते गए , समझते गए 
देवताओं को 
नकारते गए 
और
अपने ही देवता 
गढ़ते गए 
ये कोई अफसोस नहीं 
बस अपनी ज़िन्दगी है 
अपना सलीका है.
---द्वारा महेश चन्द्र रस्तोगी 
१८/०५/२०११ 

Tuesday, March 8, 2011

उनकी बात

क्या बात है उनकी कि कही जाती नहीं
तो चलो फिर आज अपनी ही बातें करें
मेरा ख्याल, है जुदा उनके हर ख्याल से
फिर क्यों रह रह कर उनकी ही बाते करें
उनकी बातों में खनक है मेरी खामोशी से
है फ़िक्र, न कहीं खामोशी की बातें करें
बरसें ये बादल, बात कुछ ठहर पाती नाहीं
भीगें, कुछ इस तरह बारिश की बातें करें।
महेश चन्द्र रस्तोगी