POEMS

Wednesday, August 3, 2022

हुआ जब रू-ब-रू मैं ज़िन्दगी से

हुआ जब रू-ब-रू मैं ज़िन्दगी से
ख़ुद अपने घर में मेहमाँ हूँ तभी से।
कोई मरता है क्या अपनी खुशी से 
भले लड़ता रहे वो ज़िन्दगी से।
नफ़ा' दुश्मन बनाने से मिले गर
तो मतलब क्या रहा फिर दोस्ती से।
हमारा हक़ मिले इसके लिए भी 
हमें लड़ना पड़ा हर आदमी से।
बहुत रोया था जब पैदा हुआ था
कि यारी हो गई अब रोशनी से।
नहीं कुछ भी अगर है आदमी तो
उमीदें क्यों लगाईं आदमी से।
ग़ज़ल कैसी कही तूने सुख़नवर 
कि कुछ सीखा नहीं उस्ताद जी से।
अब इस दिल को है दरकार और ही कुछ 
कहाँ बहले है ये अब शायरी से।
नमस्ते भर ही छूटी 'चन्द्र' बस फिर
बिना गलती निकाला नौकरी से।