POEMS

Monday, July 18, 2011

ChhoTi Bhulen

chhoti chhoti bhulen milkar hamko insaan bhi banaati hain.
chhoti chhoti bhulen milkar hamko insaan bhi banaati hain.

ताले

मेरा ही आँगन सूखा रह जाता है
जबकि मेरी छत से ही होकर जाता है बादल
सितारों से जड़ी ओढ़नी का क्या करूँ

नर्म मखमली कालीन का क्या करूँ
गुलाबी गालों के
रसीले होंठों के
होने का क्या करूँ / ये मेरे नहीं
माथे पे शराफत label का चस्पा है
ताले तोड़ूँ कैसे
मेरा ही कमरा है खुशबू से महरूम
जबकि मेरी ही खिड़की से होकर जाती है बहार
------ द्वारा: महेश चन्द्र रस्तोगी