POEMS

Thursday, October 29, 2020

मज़ाहिया ग़ज़ल

२२१२   २२१२    २२१२
मज़ाहिया ग़ज़ल
स्वरचित

थे कमअसर जब तक गुजर खिचड़ी पे थी
किस्मत भी अपनी दिलरुबा बिगड़ी पे थी।
है बात उन गुजरे दिनों की दोस्तों
पकती गिज़ा दो जून की सिगड़ी पे थी।
दीदार भी ऐसे किये दिलदार के
सलवार पे चढ़ती नज़र मकड़ी पे थी।
इक बात पे चढ़ झाड़ से तोड़े चने
ये इश्क था औ'र बात भी पगड़ी पे थी।
शाकुन्तले की चाहतों का ये सिला
दुष्यंत की चाहत टिकी मुँदड़ी पे थी।
था तीसरा शब का पहर जागे हुए
बस बात कुछ अटकी हुई रबड़ी पे थी।
बचपन में खाई मार मम्मी की बड़ी
चन्द्र  खुली वो ऐंठ जो चमड़ी पे थी।
----महेश चन्द्र रस्तोगी 

Sunday, October 25, 2020

ग़ज़ल: हादिसे हो भी जाते हैं पता नहीं चलता

Ghazal by Mahesh Chandra Rastogi

बताते हैं ये इशारे पता नहीं चलता 
हादिसे होने वाले पता नहीं चलता।

ज़िस्म तिरने लगें पानी पे बाद मरने के 
खोखले ज़िस्म आते हैं पता नहीं चलता ।

बोल दो प्यार के कहकर खड़े खड़े पल में 
कब वो दिल को चुराते हैं पता नहीं चलता ।

खैरख्वाह थे हमारे वो कभी सदी गुजरी
लोग क्यूँ मन घटाते हैं पता नहीं चलता ।

जिन्दगी है अभी बाकी तु मिल सनम आके
रूह , कब जिस्म छुड़ाते हैं पता नहीं चलता ।

आस खोने चला रुक देख छँट रही स्याही 
हौसले ही जिताते हैं पता नहीं चलता ।

क्या बड़ी बात है मिल जाये यार 'चन्द्र' फिर
दिल दिलों को मिलाते हैं पता नहीं चलता । 

-----द्वारा महेश चन्द्र रस्तोगी 
२६/१०/२०२०