POEMS

Thursday, October 29, 2020

मज़ाहिया ग़ज़ल

२२१२   २२१२    २२१२
मज़ाहिया ग़ज़ल
स्वरचित

थे कमअसर जब तक गुजर खिचड़ी पे थी
किस्मत भी अपनी दिलरुबा बिगड़ी पे थी।
है बात उन गुजरे दिनों की दोस्तों
पकती गिज़ा दो जून की सिगड़ी पे थी।
दीदार भी ऐसे किये दिलदार के
सलवार पे चढ़ती नज़र मकड़ी पे थी।
इक बात पे चढ़ झाड़ से तोड़े चने
ये इश्क था औ'र बात भी पगड़ी पे थी।
शाकुन्तले की चाहतों का ये सिला
दुष्यंत की चाहत टिकी मुँदड़ी पे थी।
था तीसरा शब का पहर जागे हुए
बस बात कुछ अटकी हुई रबड़ी पे थी।
बचपन में खाई मार मम्मी की बड़ी
चन्द्र  खुली वो ऐंठ जो चमड़ी पे थी।
----महेश चन्द्र रस्तोगी 

No comments: