मज़ाहिया ग़ज़ल
स्वरचित
थे कमअसर जब तक गुजर खिचड़ी पे थी
किस्मत भी अपनी दिलरुबा बिगड़ी पे थी।
है बात उन गुजरे दिनों की दोस्तों
पकती गिज़ा दो जून की सिगड़ी पे थी।
दीदार भी ऐसे किये दिलदार के
सलवार पे चढ़ती नज़र मकड़ी पे थी।
इक बात पे चढ़ झाड़ से तोड़े चने
ये इश्क था औ'र बात भी पगड़ी पे थी।
शाकुन्तले की चाहतों का ये सिला
दुष्यंत की चाहत टिकी मुँदड़ी पे थी।
था तीसरा शब का पहर जागे हुए
बस बात कुछ अटकी हुई रबड़ी पे थी।
बचपन में खाई मार मम्मी की बड़ी
चन्द्र खुली वो ऐंठ जो चमड़ी पे थी।
----महेश चन्द्र रस्तोगी
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