किस काम के लिए आये थे
कुछ याद नहीं
क्या करने लगे ?
क्यों करने लगे ?
बस कुछ करना है
और करते गए !
लोग सही - गलत
समझाते रहे
हम अपना सही - गलत
बनाते रहे
अपनी ही तरह से
देखते गए , समझते गए
देवताओं को
नकारते गए
और
अपने ही देवता
गढ़ते गए
ये कोई अफसोस नहीं
बस अपनी ज़िन्दगी है
अपना सलीका है.
---द्वारा महेश चन्द्र रस्तोगी
१८/०५/२०११