POEMS

Wednesday, May 18, 2011

अपना सलीका

किस काम के लिए आये थे 
कुछ याद नहीं 
क्या करने लगे ?
क्यों करने लगे ?
बस कुछ करना है 
और करते गए !
लोग सही - गलत 
समझाते रहे 
हम अपना सही - गलत 
बनाते रहे 
अपनी ही तरह से 
देखते गए , समझते गए 
देवताओं को 
नकारते गए 
और
अपने ही देवता 
गढ़ते गए 
ये कोई अफसोस नहीं 
बस अपनी ज़िन्दगी है 
अपना सलीका है.
---द्वारा महेश चन्द्र रस्तोगी 
१८/०५/२०११