POEMS

Sunday, May 4, 2008

क्यों अच्छी लगती है

क्यों अच्छे लगते हैं?
स्वरचित 
_____महेश चन्द्र रस्तोगी 

तेरे पांव की महावर
तेरे नाखूनों की लाली
तेरे माथे का टीका
तेरे कानों की बाली
तेरी नाभि से नीचे
सरकती
चांदी की चमकती
कमरबंद की लड़ियाँ
साड़ी से उलझती
तेरी पद ताल
कजरारे नयनों में 
करती अठखेलियां 
कारी कारी पुतलियाँ 
होंठों के गुलाबी 
कमल की पंखुड़ियां 
खुलती सिकुड़ती सिमटती
सख्ती में भिंचती
कमान सी खिंचती
मुस्कुराती 
चपला सी चमकती 
दंतपंक्ति
अच्छे लगते हैं ।

_____महेश चन्द्र रस्तोगी 
१०/११/२०२०

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