हर हसीं गुलशन को तू सहरा बनाता चल
और फिर सहराओं के तू गीत गाता चल।
हो सके सहरा को तू गुलशन बनाता चल
फिर बहारों पर कोई नग़्मा भी गाता चल
हर तरफ़ शादाब धरती देखनी हो गर
रेग़ज़ारों में भी तू दरिया बहाता चल
पत्थरों के शह्र से यूॅं ही गुज़रना क्या
घिस के हर पत्थर को तू शीशा बनाता चल
मुल्क पर अहसान ये भी कम नहीं होगा
शादियां कर सात आबादी बढ़ाता चल
बुत-परस्ती राह है उस तक पहुंचने की
अपने इस विश्वास को आगे बढ़ाता चल।।
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