POEMS

Friday, November 29, 2024

तलाश कर ही लिया मौक़ा ए ख़ुशी मैंने

कुछ इस तरह ही सही पाई तो ख़ुशी मैंने 
कि गालियाॅं दीं उसे आज भर के जी मैंने।।
किया वो बे-अदबी बज़्म में अदब की यूॅं 
कि रंज होता है की किस से दोस्ती मैंने ।।
चला था कू-ए-सनम सोच कर वो मिल जाए 
वहाॅं मिला जो मुझे पाया अजनबी मैंने ।।
उठा के ज़ाम लबों की बुझाई प्यास मगर 
बढ़ा कुछ और ली है अपनी तिश्नगी मैंने।।
लुटा रहा हूॅं हर इक पल तुझी पे अपने सभी 
तुझे तो फिर भी ख़फ़ा पाया ज़िन्दगी मैंने।।
न आए रास जो आब-ए-समुंदर उसको ही 
तो  डाल दी है कुएं में फिर मेंढकी मैंने।।
न उनकी आबरू पर हर्फ़ कोई आने दिया 
निभाई भी है अगर उनसे दुश्मनी मैंने ।।
दुआएं ख़ास की होती क़ुबूल देखी 'चन्द्र'
बुतान-ए-दैर की दी छोड़ बन्दगी मैंने।।
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यूॅं ही ये मिलती नहीं इसको पाना पड़ता है 
ख़ुशी की राह में दुश्मन ज़माना पड़ता है ।।

बढ़ें जो पाप तो कुछ आस्माॅं से होता नहीं 
ज़मीन पर तो ख़ुदा को भी आना पड़ता है ।।

ये दोस्ती भी चढ़ाती है क़र्ज़ यारों पर
जिसे कि वक़्त ए मुसीबत चुकाना पड़ता है।।

कहीं ये तोंद न बाहर निकलने लग जाए
जनाब जो भी है खाया पचाना पड़ता है।।।

ख़ुदा ही लाए है इस ज़िंदगी में पल दुःख के 
ग़ज़ब कि उस को ही दुखड़ा सुनाना पड़ता है।।

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