POEMS

Tuesday, April 30, 2024

ग़ज़ल: इतना ढेर ख़ज़ाना बख़्शा तारों का


२२-२२-२२-२२-२२-२
इतना ढेर ख़ज़ाना बख़्शा तारों का
फिर भी दामन ख़ाली है अंधियारों का।।१

ख़ुद्दारी पर चोट लगे तो मुमकिन है 
राह अलग अपनी कर लेना यारों का ।।२

इतिहास उठा के देखो तो उस वक़्त में भी 
तख्त ओ ताज पे कब्जा था गद्दारों का ।।३

जैसा काम दिया कुदरत ने करते हैं 
जो राह मिली वो रस्ता है बंजारों का ।।४
राह=path, रस्ता=passage

करते हैं दिन-रात गुजारा वादों पर
रोज वो फेंके फंदा खाली नारों का।।५

अपने पग खुद आप कुल्हाड़ी मारी और 
दोष निकाला सारा 'चन्द्र' सितारों का।।६
___चन्द्र
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मोह का त्याग करो फिर प्रेम करो चाहे जितना 
फूल न छेड़ो रस खुशबू का लो चाहे जितना 

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