POEMS

Thursday, September 17, 2020

इक ग़ज़ल और


मेरी मौलिक अप्रकाशित रचना
प्रस्तुत है 

कर न कर तू प्यार ना कर पर युँही तकरार ना कर
मैं खुला हूँ तू भी खुल यूँ पीठ पीछे वार ना कर ।

लड़ रहे आपस में सब पीले हरे नीले नर॔गी
ऐ चमन के बागबाँ खारों से इतना प्यार ना कर।

कल बना, पुरजा बना, पुल रेल और तोपें बना तू
देख पर लोहा रहे लोहा इसे तलवार ना कर।

उल्फतों के नाम पर फितने बिठाए दिल ज़िगर जाँ
और अहसाँ अब दिखावे के मेरी सरकार ना कर।

चल रहा सोंटा शहर भर कौन फूटा कौन साबुत 
है कहीं खाता ये 'चन्द्र' अब बज़ा इसरार ना कर।

स्वरचित 
द्वारा महेश 'चन्द्र' रस्तोगी 
17/09/2020

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