पत्थर पे रख सिर सो लिये
हाथों में ढक मुँह रो लिये ।
रख ख्वाब गिरवी सोये यूँ
आँखों में काँटे बो लिये ।
मेरा बने थी चाह पर
गैरों की सफ़ में हो लिये।
हों दूर साये से तेरे
खुद भीड़ में हम खो लिये ।
जो है ख़फा ,तस्कीन है
बिखरे सुकूँ थे, पो लिये ।
यारी हुई कुछ इस तरह
अब 'चन्द्र' यादों को लिये ।
महेश चन्द्र रस्तोगी 'चन्द्र '
16/09/2020
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